अजीब सी दास्तां है...... हमारे मां-बाप अपनी जहान "गांव" छोड़ "शहर"आते हैं, सपनों को सच करने आते हैं अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने आते हैं अपने बचपन के दोस्तों को छोड़, अपने बच्चों को बेहतर बचपन देने आते हैं। अपनी गलियों से दूर, अपने वादे लेकर आते हैं बच्चों को पढ़ाने के लिए हर कोशिश करते हैं, "बाइक" नहीं तो "साइकिल" से ही स्कूल छोड़ते हैं, 7:00 बजे उठने वाली मां भी, 6:30 बजे लंच पैक कर देती है, बच्चों के एग्जाम के कारण, कितने पाटिया मिस कर देती है, बुरा तब लगता है ,जब बच्चे थोड़े बड़े होते हैं पढ़ाई को ठीक से समझते ही हैं, कि उनकी पढ़ाई बंद करने को सोचते हैं। उसके कैरियर के अंतिम छोर पर, उसका साथ छोड़ देते हैं, लोगों की बात सुनकर अपनी बेटी का सपना तोड़ देते हैं, खोजने लगते हैं, अपने सपनों के दमाद को और भूल जाते हैं ,अपने बच्चों के सपने को भूल जाते हैं वह अपनी साइकिल सवारी को, भूल जाते हैं वह अपनी छोटी-छोटी कुर्बानी को, भूल जाते हैं वह अपने वादे को भूल जाते हैं वह अपने बच्चों की पढ़ाई को.