अनन्त को अंत समझ लेते हैं
अनन्त को अंत समझ लेते हैं
मेरी बातें ,मेरे वादे ,मेरी बर्बादी ,मेरी है
मेरी चाल ,मेरी चाहत, मेरी जहान,मेरी है,
मैं खुद को खुद से जीताती हूं,क्योंकि जीतने का वजह भी मैं हूं,
जिंदगी के इस सफर में हार को अपनाती हूं,
वजह हार की, सिर्फ मैं हूं,
गुनाह किया तो मैंने किया,मेहनत से मैं भागी फिरी ,
फिर क्यों मैं संसार से जवाब ढूंढती हूं,
कुछ बातों की कोई वजह नहीं होती
हम बेवजह खामोशियों का वजह ढूंढते रह जाते हैं,
हमें पता है उन खामोशियों की कोई जुबां नहीं होती
हम बेवजह आसमान में तारे ढूंढते हैं,
हमें पता है उन तारों की कोई अंत नहीं होती
हम बेवजह अनंत को अंत समझ लेते हैं,
हार तो सिर्फ जिंदगी का एक पल है
हम उसे पॉवरफुल समझ लेते हैं,
हार तो हर किसी के जिंदगी में आता है
और एक नया मोड़ दे जाता है,
नई राहें, नई वादे, नई वादी
फिर से मेरी हो जाती है,
उन खामोशियों को मिटा कर खूबसूरत हो जाते हैं।
AuthorRishika Gupta

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